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‘लोभ’ – जो कभी तृप्त नहीं होने देता

आत्मा स्वभाव से शुद्ध और ज्ञानमय है, परंतु कषायों के कारण वह कर्मों से आच्छादित हो जाती है।
क्रोध, मान, माया और लोभ – ये चार कषाय आत्मा को संसार के चक्र में बाँधते हैं। इनमें लोभ सबसे सूक्ष्म और
सबसे दीर्घकालीन कषाय माना गया है, क्योंकि यह जीवन के हर चरण में किसी न किसी रूप में जीव के साथ बना
रहता है। जब तक लोभ जीव के भीतर विद्यमान रहता है, तब तक आत्मा की मुक्ति की यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती।
लोभ का अर्थ केवल धन या संपत्ति की लालसा नहीं है। जो प्राप्त हो चुका है उसमें असंतोष और जो अप्राप्त है उसकी
निरंतर आकांक्षा – यही लोभ है।
पद, प्रतिष्ठा, सुविधा, मान-सम्मान, संबंध, यहाँ तक कि धर्म के क्षेत्र में भी जब अपेक्षा जुड़ जाती है, तब वह लोभ का
ही रूप बन जाती है।
लोभ आत्मा को कर्मों से कैसे बाँधता है?
यह प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म है। लोभ के कारण किया गया कर्म बाह्य रूप से भले ही शुभ दिखाई दे, पर भीतर अपेक्षा
छिपी रहती है। यही अपेक्षा कर्म को आत्मा से चिपका देती है। लोभ से प्रेरित होकर किया गया दान, सेवा या तप भी
शुद्ध नहीं रह पाता, क्योंकि उसमें फल की कामना जुड़ी होती है।
लोभ से बंधे कर्मों के परिणाम केवल भविष्य तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वर्तमान जीवन को भी अशांत बना देते हैं।
लोभी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता। उसे जितना मिलता है, उससे अधिक की चाह उत्पन्न होती जाती है। तुलना,
ईर्ष्या, असुरक्षा और भय – ये सब लोभ के ही उपफल हैं। आगमों में कहा गया है कि लोभ से पाप कर्मों की वृद्धि होती
है। परलोक में यही कर्म दुःखद गतियों का कारण बनते हैं।


इसके विपरीत, जब जीव लोभ का त्याग कर संतोष भाव को अपनाता है, तब कर्मबंधन शिथिल होने लगता है। संतोष
आत्मा को हल्का करता है और कर्मों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।
‘संतुट्वस्स सदा सुखं’ अर्थात संतोषी जीव सदा सुखी रहता है।
लोभरहित भाव से की गई आराधना शुद्ध शुभ पुण्य का कारण बनती है और आत्मा को उर्ध्वगति की ओर ले जाती है।
अपरिग्रह का अभ्यास, कम में संतोष और अधिक का सहज त्याग – यही लोभ पर विजय पाने के व्यावहारिक उपाय हैं।
लोभ का त्याग कोई एक दिन की क्रिया नहीं, अपितु निरंतर अभ्यास है।
जो व्यक्ति लोभ को पहचानकर उसे सीमित करना सीख लेता है, वही संसार में रहते हुए भी कर्म बंधनों से मुक्त होने
लगता है।

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