जैन दर्शन में आत्मा को स्वभावतः शुद्ध, बुद्ध और मुक्त माना गया है। किंतु अज्ञानवश जब आत्मा राग-द्वेष और कषायों में
लिप्त होती है, तब कर्मों का बंधन होता है। इन्हीं कषायों में क्रोध सबसे प्रबल और विनाशकारी माना गया है। क्रोध न केवल
वर्तमान शांति को भंग करता है, बल्कि आत्मा को मोक्ष (सिद्धत्व) से भी दूर ले जाता है।
क्रोध क्या है? – क्रोध वह मानसिक विकार है, जिसमें प्रतिकूल परिस्थिति या व्यक्ति के प्रति द्वेष, आक्रोश और प्रतिशोध की
भावना उत्पन्न होती है। यह कषाय आत्मा के साथ कर्मों की गांठ (बंधन) बाँध देता है, जिससे आत्मा अपनी स्वाभाविक
शुद्धता को प्रकट नहीं कर पाती।
करमों का बंधन कैसे होता है?
जब आत्मा क्रोध में आती है, तब उसकी चेतना विकृत हो जाती है। उसी क्षण सूक्ष्म कर्म पुद्गल आत्मा की ओर आकृष्ट
होकर उससे चिपक जाते हैं। क्रोध जितना तीव्र और दीर्घकालिक होता है, कमों का बंधन उतना ही घना और दीर्घायु होता है।
क्रोध के दुष्परिणाम
- मानसिक अशांति और तनाव
- पारिवारिक संबंधों में विघटन
- रोग, दुःख और प्रतिकूल परिस्थितियाँ
- दुर्गति का कारण
क्षमा का फल
जहाँ क्रोध आत्मा को बाँधता है, वहीं क्षमा और समता शुभ कमों का बंधन कराते हैं।
- मानसिक शांति और संतुलन
- सद्भावपूर्ण संबंध
- पुण्यवानि और सद्गति
- आत्मिक उन्नति व मोक्ष मार्ग में प्रगति
जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है ‘सुखमात्मनः प्रशमात्’ अर्थात आत्मा को सच्चा सुख प्रशमन (शांति) से प्राप्त होता है।
प्रभु महावीर की वाणी बताती है ‘खंती परमं तपो’ अर्थात क्षमा सर्वोत्तम तप है।
क्रोध का त्याग कर क्षमा-भाव का विकास करने, दान-सेवा और करुणा का आचरण करने, सामायिक-प्रतिक्रमण-ध्यान
करने तथा गुरु भगवंतों की वाणी का श्रवण करने से पुण्यवानी का बंध किया जा सकता है।
क्रोध का क्षय एक साधना है। इसके लिए
- परिस्थिति को समता से देखना
- क्षणिक मौन धारण करना
- आत्म निरीक्षण
- परिणामों का चिंतन
क्रोध क्षणिक आवेग प्रतीत होता है, परंतु उसका प्रभाव दीर्घकालिक और गहरा होता है। क्रोध को जीतना वास्तविक विजय है।
क्षमाशील व्यक्ति जीवन को प्रसन्नता से जीता है। हर समय वह आनंद में रहता है।
क्षमा, समता और संयम के माध्यम से ही आत्मा कर्म बंधन से मुक्त होकर सिद्धत्व को प्राप्त कर सकती है।

