स्व. श्री पारसमलजी गुलाबचंदजी चोपड़ा | Parasmalji Chopda

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Parasmalji Chopda

श्री पारसमलजी चोपड़ा का जन्म राजस्थान के एक शांत और सरल ग्राम करमावास में श्री गुलाबचंदजी – श्रीमती बाबूबाई चोपड़ा के घर हुआ। प्रारंभिक बाल्यकाल कानाना में व्यतीत किया। 13 वर्ष की आयु में अपनी वंशानुगत दुकान हुबली (कर्नाटक) में आये। जहाँ आपने गुजराती विद्यालय से 10वीं तक की शिक्षा पूर्ण की और अपने पिताश्री के थोक वस्त्र व्यापार में सहयोग देते हुए अपना निजी व्यवसाय हुबली होलसेल क्लॉथ डिपो से शुभारंभ किया और उसमें सफलता के कई आयाम स्थापित किए।

दूरदर्शिता और कठोर परिश्रम के बल पर आपने हुबली में वस्त्र एजेंसी और ट्रेडिंग के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए तथा प्रतिष्ठित ‘मैचिंग सेंटर’ की स्थापना की। मात्र 17 वर्ष की आयु में आपका विवाह श्रीमती अमरावतिबाई के साथ हुआ, जिनके साथ आपने एक आदर्श, सरल एवं आध्यात्मिक जीवन जिया।

आपके जीवन की दिशा उस समय बदली जब परम पूज्य ब्रह्मचारीजी से आपकी भेंट हुई, जिन्होंने आपको श्रीमद राजचंद्रजी की शिक्षाओं से परिचित कराया – जो भगवान महावीर के आत्मजाग्रत संत माने जाते हैं। यह आध्यात्मिक संबंध आजीवन आपके चिंतन एवं व्यवहार का आधार बना। आपको विशेष रूप से ‘अगास आश्रम’ से अत्यंत लगाव था। आपने वहाँ एक
निवास निर्मित किया और आत्मचिंतन एवं भक्ति में अनेक दिन व्यतीत किए। यद्यपि यह यात्रा निजी थी, परंतु उद्देश्यपूर्ण भी – आपने श्रीमद राजचंद्रजी की शिक्षाओं एवं आत्मिक अनुभूतियों को अपने परिवारजनों व संतति को आत्मसात कराया, ताकि यह ज्ञान परंपरा बनी रहे।

आपका जीवन केवल आध्यात्मिक या व्यावसायिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था – आपकी मिलनसारिता, सौम्यता और परोपकारी स्वभाव आपको समाज में अत्यंत प्रिय बनाते थे।
आपने अनेक लोगों को सहयोग देकर उनके जीवन और व्यवसाय को नई दिशा दी। आपका जीवन इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान, करुणा और विनम्रता से व्यक्ति सच्चे अर्थों में समृद्ध बनता है। अपने अंतिम वर्षों में श्री पारसमलजी ने एक शांत, चिंतनशील और पूर्णतः जैन धर्म में समर्पित जीवन जिया।

उनके विचार, शिक्षाएं और जीवनशैली आज भी उनके संतानों, पौत्र-पौत्रियों और प्रपौत्रों के लिए प्रेरणा का सोत हैं। उनकी विरासत इस बात की जीवंत मिसाल है कि कैसे उद्देश्यपूर्ण जीवन, करुणा और अडिग आस्था से महान बनता है।