प्रथम भव : श्री विमलवाहनजी
जम्बूद्वीप के महाविदेह क्षेत्र की सीता नदी के दक्षिण तट पर वत्स नामक देश में “सुसीमा” नाम की नगरी थी। वहाँ “विमलवाहन” नामक राजा राज्य करता था। वह बड़ा न्याय एवं धर्मप्रिय था। एक समय संसार की विचित्रता पर विचार करके उसे वैराग्य उत्पन्न हो गया। उसने श्री अरिमर्दनजी नामक मुनिवर के पास दीक्षा ग्रहण की। निरतिचार संयम का पालन करते हुए उसने बीस स्थानक की आराधना की और “तीर्थंकर नाम कर्म का उपार्जन” किया। एकावली, कनकावली आदि अनेक प्रकार की तपस्या की। अन्तः में संथारा संल्लेखना ग्रहण कर देह का त्याग किया। वह मरकर विजय नामक अनुत्तर विमान में तेतीस सागरोपम की आयु वाला देव हुआ।
द्वितीय भव : देव
वहाँ देवताओं के शरीर एक हाथ के होते हैं। उनके शरीर चन्द्रकिरणों की तरह उज्जवल होते हैं। वे सदैव अनुपम सौख्य आनन्द का अनुभव करते रहते हैं। वे अपने अवधिज्ञान से समस्त लोक नालिका का अवलोकन करते हैं। तेतीस हजार वर्ष में एक बार उन्हें भोजन की इच्छा होती है। विमलवाहन मुनि का जीव भी इसी स्वर्गीय सुख का अनुभव करने लगा। जब आयु के छह महीने शेष रहे तब अन्य देवताओं को दुःख होता हैं, पर, उन्हें देवलोक से चवने का किंचित् भी दुःख नहीं हुआ। प्रत्युत भावी तीर्थंकर होने के नाते उनका तेज और भी बढ़ गया।
तृतीय भव : भगवान श्री अजितनाथजी का जन्म
भरत क्षेत्र में “विनीता” नामकी सुप्रसिद्ध नगरी थी। इस नगरी में इक्ष्वाकु वंशतिलक अनेक राजा हो गये। उसी इक्ष्वाकु वंश का “जितशत्रु” नाम का राजा राज्य करता था। उसके छोटे भाई का नाम “सुमित्र विजय” था वह युवराजा था। जितशत्रु राजा की रानी का नाम “विजयादेवी” एवं सुमित्रविजय की रानी का नाम “वैजयन्ती” था। दोनों रानियाँ अपने रूप और गुण में अनुपम थी। “वैशाख शुक्ला तेरस” को विमलवाहन मुनिराज का जीव, महारानी विजयादेवी की कुक्षि में विजय नाम के अनुत्तर विमान से चवकर उत्पन्न हुआ। उस रात्रि के अन्तिम प्रहर में महारानी ने चौदह महास्वप्न देखे। उसी रात को युवराज सुमित्रविजय की महारानी वैजयन्ती ने भी चौदह महास्वप्न देखे किन्तु श्रीमती विजयादेवी के स्वप्नों की प्रभा की अपेक्षा इनके स्वप्नों की प्रभा कुछ
मंद थी।
दूसरे दिन स्वप्नपाठकों को बुलाया गया और उनसे स्वप्न का फल पूछा। स्वप्नपाठकों ने कहा- “महारानी विजयादेवी त्रिलोक पूज्य तीर्थंकर महापुरुष को जन्म देगी और युवराज्ञी वैजयंती चक्रवर्ती की माता बनेगी।” स्वप्नपाठकों से स्वप्न का फल सुनकर सब प्रसन्न हो गये। दोनों महारानियाँ अपने-अपने गर्भ का विधिवत् पालन करने लगी।
गर्भकाल पूर्ण होने पर महारानी विजयादेवी ने ‘माघ शुक्ला अष्टमी’ की रात्रि में लोकोत्तम पुत्ररत्न को जन्म दिया। बालक के जन्मते ही तीनों लोक में दिव्य प्रकाश फैल गया। इन्द्रों के आसन चलायमान हो गये। आकाश में देव दुंदुभियाँ बजने लगीं। भगवान के जन्म का समाचार पाकर छप्पन दिग्कुमारिकाएँ आईं और भगवान को तथा उनकी माता को प्रणाम कर अपने-अपने
कार्य में लग गई। चौसठ इन्द्रों ने तथा असंख्य देवी देवताओं ने भगवान का जन्मोत्सव किया। भगवान के जन्म के थोड़े काल के बाद ही युवराज्ञी वैजयन्ती ने भी एक दिव्य बालक को जन्म दिया। पुत्र और भतीजे के जन्म की बधाई पाकर महाराज जितशत्रु बड़े प्रसन्न हुए। पुत्र जन्म की खबर सुनाने वाले को महाराज ने खूब दान दिया। बन्दीजनों को मुक्त किया और सारे नगर में उत्सव मनाने का आदेश जारी किया। प्रजा ने भी अपने भावी सम्राट का दिल खोलकर स्वागत किया।
शुभ मुहूर्त में पुत्र का नामकरण किया गया। महारानी विजयादेवी के गर्भ के दिनों में महाराजा के साथ पासे के खेल में सदा महारानी की ही विजय होती थी। इस जीत को गर्भ का प्रभाव मानकर बालक का नाम ‘अजितकुमार’ एवं युवराज्ञी के पुत्र का नाम ‘सगरकुमार’ रखा गया। अजितकुमार जन्म से ही तीन ज्ञान के धारक थे। अतः उनको पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किन्तु सगरकुमार अध्यापक के पास रहकर अध्ययन करने लगे। सगरकुमार की बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण थी। उन्होंने अल्पायु में ही समस्त कलाओं में निपुणता प्राप्त कर ली। दोनों कुमार युवा हो गये। उनका शरीर समचतुरस्त्र था। वज्रऋषभनाराज संहनन होने से वे बड़े शक्तिशाली थे।
विवाह के योग्य जानकर माता-पिता ने उनका सैकड़ों रूपवती कन्याओं के साथ विवाह कर दिया। दोनों राजकुमार यौवनवय का आनंद लेने लगे। अवसर पाकर महाराजा जितशत्रु ने अजितकुमार का राज्याभिषेक किया। अजितकुमार के राजा बनने के बाद उन्होंने सगरकुमार को युवराज के पद पर प्रतिष्ठित किया।
एक दिन महाराज अजितकुमार एकान्त में बैठकर सोचने लगे अब मुझे सांसारिक भोगों का परित्याग कर स्व-पर कल्याण के मार्ग का अनुसरण करना चाहिये। बन्धनों को छेदन कर निर्बन्ध, निष्क्रमण और निर्विकार होने के लिए अविलम्ब त्याग मार्ग को स्वीकार कर लेना चाहिये। भगवान का यह चिन्तन चल ही रहा था कि इतने में लोकान्तिक देवों का आसन चलायमान हुआ।
उन्होंने अपने ज्ञान से देखा कि अर्हंत् अजितनाथ के निष्क्रमण का समय निकट आ गया है। वे भगवान के पास आये और परम विनीत शब्दों में निवेदन करने लगे- “हे भगवन् ! हे लोकनाथ ! जीवों के हित, सुख और मुक्तिदायक धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करो।” इस प्रकार दो-तीन बार निवेदन करके और भगवान को प्रणाम करके देवगण लौट गये।
भगवान श्री अजितनाथजी ने निश्चय किया कि मैं एक वर्ष के पश्चात् संसार का त्याग कर दूँगा। भगवान का अभिप्राय जानकर प्रथम स्वर्ग के अधिपति देवेन्द्र ने वर्षीदान की व्यवस्था करवाई। प्रभु श्री अजितनाथजी भगवान नित्य प्रातःकाल एक करोड़ आठ (1,08,00,000) लाख सुवर्ण मुहरों का दान करने लगे। उधर युवराज श्री सगर ने भी विशाल दानशाला खोल दी। जिसमें
हजारों याचक आहार-वस्त्र आदि ऐच्छिक वस्तु प्राप्त करने लगे। इस प्रकार भगवान श्री अजितनाथजी ने एक वर्ष की अवधि में तीन अरब, अठासी करोड़, अस्सी (3,88,80,00,000) लाख सुवर्ण मुद्राओं का वार्षिक दान किया। वर्षीदान देने के पश्चात् शक्रेन्द्र का आसन चलायमान हुआ। वह भगवान के पास आया। अन्य इन्द्रों, देवों तथा देवियों ने भगवान का दीक्षा महोत्सव किया। भगवान श्री अजितनाथजी ने भी अपने लघु भ्राता सगर का राज्याभिषेक किया और सगरकुमार को विनीता का राजा बनाया।
देवों ने ‘सुप्रभा’ नाम की शिविका तैयार की। भगवान ने सुन्दर वस्त्रालंकार धारण किये और शिविका पर आरूढ़ हो गये। शिविका को देव तथा मनुष्य वहन करने लगे। उत्सव पूर्वक विशाल जन समूह के साथ शिविका ‘सहस्राम्र उद्यान’ में पहुँची। ‘माघ शुक्ला नवमी’ के दिन दिवस के पिछले प्रहर में जब चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में आया तब भगवान श्री अजितनाथजी ने सम्पूर्ण
वस्त्रालंकार उतार दिये। इन्द्र द्वारा दिये गये देवदूष्य को धारण किया। पंचमुष्ठि लोच किया। सिद्ध भगवान को प्रणाम कर के नव-कोटि सामायिक चारित्र ग्रहण किया। उस दिन भगवान अप्रमत गुणस्थान में स्थित थे। भावों की उच्चतम अवस्था के कारण उसी समय भगवान को चतुर्थ ‘मनःपर्यवज्ञान’ उत्पन्न हो गया। इस मनःपर्ययज्ञान से वे मन वाले प्राणियों के मनोगत भावों को जानने लगे। भगवान के साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के पश्चात् श्री अजितनाथजी भगवान ने सहस्राम उद्यान से विहार कर दिया।
दूसरे दिन श्री अजितनाथजी भगवान ने अपने बेले का पारणा ब्रह्मदत्त राजा के घर ‘परमान्न’ (खीर) से किया। पारणे के समय देवों ने पंच दिव्य वृष्टि की और दान देने वाले की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। तीर्थेश प्रभु श्री अजितनाथजी भगवान तप संयम की आराधना करते हुए ग्रामानुग्राम विचरने लगे। इस प्रकार छद्मस्थ अवस्था में विचरते हुए भगवान के बारह वर्ष व्यतीत हो गये।
‘पौष मास की शुक्ल 11’ के दिन तीर्थंकर भगवान श्री अजितनाथजी विहार करते हुए पुनः सहस्राम्र उद्यान में पधारे। उस दिन भगवान के बेले का तप था। ध्यान करते हुए श्री अजितनाथजी भगवान के चारों घनघाती कर्म नष्ट हो गये और केवलज्ञान, केवलदर्शन उत्पन्न हो गया। जिससे आप केवली बन गये। जिससे वे सम्पूर्ण चराचर वस्तु को जानने लगे। देवों और इन्द्रों ने
भगवान का केवलज्ञान उत्सव मनाया। समवशरण की रचना हुई। उद्यान पालक ने सगर महाराजा को प्रभु श्री अजितनाथजी के आगमन व केवलज्ञान की खबर सुनाई। महाराज सगर विशाल
आडम्बर के साथ भगवान के दर्शन-वन्दन के लिये गये। भगवान ने समवशरण के बीच अपनी देशना प्रारंभ कर दी।
दिव्य धर्म देशना : धर्मध्यान
“सुखार्थियों ! जीव अज्ञान से इतने व्याप्त हैं कि उन्हें हिताहित का वास्तविक बोध ही नहीं होता। जिस प्रकार अज्ञान के कारण जीव काँच को वैदूर्यमणि समझ कर ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार इस दुःखमय असार संसार को सुखमय एवं सारयुक्त मानता है। अज्ञान के कारण विविध प्रकार के बँधते हुए कर्मों से प्राणियों का संसार बढ़ता ही जा रहा है। कर्मों की वृद्धि से संसार
बढ़ता है और कर्मों के अभाव से संसार का अभाव होता है। इसलिए विद्वानों को कर्मों के नाश करने का ही उपाय करते रहना चाहिये।
दुर्ध्यान से कर्मों की वृद्धि होती है और शुभ ध्यान से कर्मों का नाश होता है। कर्म-मैल को समूल नष्ट करने वाले शुभ ध्यान का स्वरूप इस प्रकार है-धर्मध्यान – आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान चिंतन रूप चार प्रकार का है।
आज्ञा-विचय
आप्त पुरुषों का वचन आज्ञा कहलाती है। यह आज्ञा दो प्रकार की होती है-एक है “आगम आज्ञा” और दूसरी है-“हेतुवाद आज्ञा”। जो शब्द से ही पदार्थों का प्रतिपादन करता है, वह “आगम” कहलाता है और जो दूसरे प्रमाणों के संवाद से पदार्थों का प्रतिपादन करता है, वह हेतुवाद कहलाता है। आगम और हेतुवाद के तुल्य प्रमाण से एवं निर्दोष कारणों से जो आरंभ हो, वह लक्षण से प्रमाण कहलाता है। राग, द्वेष और मोह ये ‘दोष’ कहाते हैं। इनको सर्वथा नष्ट करने के कारण, अर्हंत में ये दोष बिलकुल नहीं होते। इसलिए दोष रहित आत्मा से उत्पन्न हुआ अर्हंतों का वचन प्रमाण होता है. अर्हंतों का वचन, नय और प्रमाण से सिद्ध, पूर्वा पर विरोध रहित, अन्य बलवान शासनों से भी बाधित नहीं होने वाला, अंग उपांग एवं प्रकीर्णकादि बहुत से शास्त्र रूपी नदियों के मिलन से समुद्र रूप बना हुआ, अनेक प्रकार के अतिशयों की साम्राज्य लक्ष्मी से सुशोभित, दुर्भव्य मनुष्यों के लिए दुर्लभ, भव्य जीवों के लिए सुलभ, आचार्य
के लिए रत्न-भण्डार के समान और मनुष्यों तथा देवों के लिए सदैव स्तुति करने योग्य है। ऐसे आगम-वचनों की आज्ञा का अवलम्बन करके, स्यादवाद न्याय के योग से द्रव्य और पर्याय रूप से, नित्यानित्य वस्तुओं का विचार करना और स्वरूप तथा पर रूप से सत् असत् रूप में रहे हुए पदार्थों में स्थिर प्रतीति करना “आज्ञा विचय” धर्म ध्यान कहलाता है।
अपाय-विचय
जिन जीवों ने जिनमार्ग का स्पर्श ही नहीं किया, जिन्होंने परमात्मा को जाना ही नहीं और जिन्होंने अपने भविष्य का विचार ही नहीं किया, ऐसे जीवों को हजारों अपाय (विघ्न-संकट) उठाने पड़ते है। जिसका चित्त माया-मोह के अंधकार से परवश हो गया है, ऐसा प्राणी अनेक प्रकार के पाप करता है और अनेक प्रकार के अपाय (कष्ट-दुःख) सहता है। ऐसा दुःखी प्राणी यदि विचार करे कि- “नारकी, तिर्यंच और मनुष्यों में मैंने जो-जो दुःख भुगते हैं, वे सभी मैंने अपने अज्ञान और प्रमाद से ही उत्पन्न किये थे। परम बोधिबीज को प्राप्त करने पर भी अविरत रह कर मन, वचन और काया की कुचेष्टाओं से मैंने अपने ही मस्तक पर अग्नि प्रज्वलित करने के समान पाप-कृत्य किया और दुःखी हुआ। बोघिरत्न (सम्यग्दर्शन) प्राप्त कर लेने पर मोक्षमार्ग मेरे सामने खुला था, किन्तु मैंने उसकी उपेक्षा की और कुमार्ग पर रुचि-पूर्वक चलता रहा। इस प्रकार मैंने स्वयं ने ही अपनी आत्मा को अपायों के गर्त में गिरा दिया। जिस प्रकार उत्तम राज्य-लक्ष्मी प्राप्त होते हुए भी (अत्यागी) मूर्ख मनुष्य, भीख माँगने के लिए भटकता रहता है, उसी प्रकार मोक्ष का साम्राज्य प्राप्त करना मेरे अधिकार में होते हुए भी मैं अपनी आत्मा को संसार में परिभ्रमण करा रहा हूँ और दुःख परम्परा का निर्माण कर रहा हूँ। यह मेरी कितनी बुरी वृत्ति है। इस प्रकार राग, द्वेष और मोह से उत्पन्न होते हुए अपायों का चिन्तन किया जाय, उसे अपाय-विचय नाम का धर्म ध्यान कहते हैं।
विपाक-विचय
कर्म के फल को विपाक कहते हैं। यह विपाक शुभ और अशुभ, दो प्रकार का होता है और द्रव्य-क्षेत्रादि की सामग्री से यह विपाक विचित्र रूप में अनुभव में आता है।
द्रव्य-विपाक-स्त्री, पुष्षों की माला और रुचिकर खाद्य आदि द्रव्यों के उपभोग से “शुभ विपाक” कहलाता है और सर्प, शस्त्र, अग्नि तथा विष आदि से जो दुःखद अनुभव होता है, वह “अशुभ विपाक” कहलाता है।
क्षेत्र विपाक-प्रासाद, भवन, विमान और उपवनादि में निवास करना शुभविपाक रूप है और श्मशान, जंगल, अटवी आदि में विवश होकर रहना, अशुभ विपाक रूप है।
काल विपाक-शीत और उष्ण से रहित ऐसी बसंत आदि ऋतु में भ्रमण करना शुभ विपाक है और शीत, उष्ण की अधिकता वाली हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में भ्रमण करना पड़े, तो यह अशुभ विपाक है। भाव विपाक-मन की प्रसन्नता-संतोष में शुभ विपाक-क्रोध, अहंकार-रौद्रादि परिणति में अशुभविपाक होता है।
भव विपाक-देव भव और भोग भूमि सम्बन्धी मनुष्यादि भव में शुभ विपाक और कुमनुष्य (जहाँ पापाचार की मुख्यता हो, जिनके संस्कार अशुभ हों और अशुभ कर्मों के उदय से अनेक प्रकार के अभाव दरिद्रतादि दुःख भोग रहे हों) तिर्यंच तथा नरकादि भव में अशुभ विपाक होता है। कहा भी है कि-“द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और भव को प्राप्त कर, कर्मों का उदय, क्षय,
क्षयोपशम और उपशम होता है।” इसी प्रकार प्राणियों को द्रव्यादि सामग्री के योग से, कर्म अपना फल देते हैं।
कर्म मुख्यतः आठ भेद हैं। यथा-१. ज्ञानावरणीय-जिस प्रकार आँखों पर पट्टी बाँधने से, नेत्र होते हुए भी दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार जिस कर्म के आवरण से सर्वज्ञ स्वरूपी जीव की ज्ञान शक्ति दब जाती है, वह ज्ञानावरणीय कर्म कहलाता है।
इसके १ मति, २ श्रुत, ३ अवधि, ४ मन पर्यय और ५ केवलज्ञानावरण, ये पाँच भेद हैं।
२. दर्शनावरणीय-पाँच प्रकार की निद्रा और चार प्रकार के दर्शन के आवरण से दर्शन-शक्ति को दबाने वाला कर्म। जिस प्रकार पहरेदार, राजा आदि के दर्शन होंने में रुकावट डालता है, उसी प्रकार दर्शन शक्ति को रोकने वाला कर्म।
३. वेदनीय-तलवार की तीक्ष्ण धार पर रहे हुए मधु को चाटने के समान यह कर्म है। जिस प्रकार तलवार की धार पर रहे हुए मधु को चाटने से, मधु की मिठास के साथ जीभ कटने की दुःखदायक वेदना भी होती है, उसी प्रकार सुखरूप और दुःखरूप यों दो प्रकार से वेदन कराने वाला कर्म।
४. मोहनीय-आत्मा को मोहित करने वाला । जिस प्रकार मद्यपान से मोहमस्त हुआ व्यक्ति, हिताहित और उचितानुचित नहीं समझ सकता, उसी प्रकार दर्शन-मोह के उदय से मिथ्यादर्शनी हो जाता है और चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से विरति- चारित्रिक परिणित रुक कर जीव, सदाचार से वंचित रहता है।
५. आयु-यह बन्दीगृह के समान है। इसके उदय से जीव नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति में अपनी आयु के अनुसार रहता है।
६. नाम-यह कर्म चित्रकार के समान है। इसका प्रभाव शरीर पर होता है। इससे जाति आदि की विचित्रता होती है।
७. गोत्र-यह ऊँच और नीच ऐसे दो भेद वाला है। यह कुंभकार जैसा है। जिस प्रकार कुंभकार क्षीर-पात्र भी बनाता है और मदिरा-पात्र भी, उसी प्रकार इस कर्म का परिणाम होता है।
८. अन्तराय-इसकी शक्ति से दान, लाभ और भोगादि में बाधा उत्पन्न होती है। जिस प्रकार राजा द्वारा दिये हुए पुरस्कार
में भंडारी बाधक होता है, उसी प्रकार यह कर्म भी दान-लाभादि में बाधक बनता है। इस प्रकार कर्म की मूल-प्रकृति के फल विपाक का चिन्तन करना, “विपाक-विचय” धर्मध्यान कहाता है।
संस्थान-विचय
जिसमें उत्पत्ति, स्थिति, लय और आदि अंत रहित लोक की आकृति का चिन्तन किया जाय, वह “संस्थान विचय” ध्यान कहलाता है। इस लोक की आकृति उस पुरुष जैसी है, जो अपने पाँव फैला कर और कमर पर दोनों हाथ रख कर खड़ा हो। लोक उत्पत्ति, स्थिति और नाश रूपी पर्यायों (अवस्थाओं) वाले द्रव्यों से भरा हुआ है। नीचे यह वैत्रासन (बेंत के बने हुए आसन-कुर्सी) जैसा है, मध्य में “झालर” जैसा और ऊपर “मृदंग” की आकृति के समान है। यह लोक तीन जगत् से व्याप्त है। इसमें प्रबल “घनोदधि” (बर्फ अथवा जमे हुए घृत से भी अधिक ठोस पानी) “घनावत” (ठोस वायु) और “तनुवात” (पतला वायु) से सात पृथ्वियें घिरी हुई हैं। अधोलोक, तिर्यक्लोक और ऊर्ध्वलोक के भेद से यह तीन लोक कहाता है। रुचक-प्रदेश की अपेक्षा
से लोक के तीन विभाग होते हैं। मेरु-पर्वत के भीतर, मध्य में गाय के स्तन की आकृति वाले और चार आकाश प्रदेश को रोकने वाले, चार रुचक-प्रदेश ऊपर और चार आकाश प्रदेश को रोकने वाले चार रुचक-प्रदेश नीचे, यों आठ प्रदेश हैं। उन रुचक प्रदेशों के ऊपर और नीच नौ सौ नौ सौ योजन तक तिर्यक्लोक कहाता है। इस तिर्यक्लोक के नीचे अधोलोक है। अधोलोक नौ सौ योजन कम सात रज्जु प्रमाण है। अधोलोक में क्रमशः सात पृथ्वियाँ हैं। इनमें नपुंसकवेद वाले नैरयिक जीवों के भयानक निवास हैं।
उन सात पृथ्वियों के नाम अनुक्रम से-रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूम्रप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा हैं। इन पृथ्वियों की मोटाई (जाड़ाई) पहली रत्नप्रभा से लगाकर नीचे अनुक्रम से-एक लाख अस्सी हजार, एक लाख बत्तीस हजार, एक लाख अट्ठावीस हजार, एक लाख बीस हजार, एक लाख अठारह हजार, एक लाख सोलह हजार और एक लाख आठ हजार योजन हैं। इनमें से रत्नप्रभा नाम की पहली पृथ्वी में तीस लाख नरकावास हैं। दूसरी में पच्चीस लाख, तीसरी में पन्द्रह लाख, चौथी में दस लाख, पाँचवी में तीन लाख, छठी में एक लाख में पाँच कम व सातवीं में केवल पाँच नरकावास हैं।
रत्नप्रभादि सातों पृथ्वियों के प्रत्येक के नीचे और नीचे वाली के ऊपर मध्य में बीस हजार योजन प्रमाण मोटा घनोदधि है।
घनोदधि के नीचे असंख्य योजन प्रमाण घनवात है। इसके नीचे असंख्य योजन विस्तार वाला तनुवात है। तनुवात के नीचे असंख्य योजन तक आकाश रहा हुआ है। इनमें क्रमशः दुःख, वेदना, आयु, रोग व लेश्यादि अधिकाधिक हैं। (रत्नप्रभा पृथ्वी में असंख्य भवनपति देव भी रहते हैं और असंख्य नारक जीव भी। शर्कराप्रभा से लगाकर महातमःप्रभा तक नारक जीव ही रहते हैं और प्रत्येक में असंख्य-असंख्य नारक हैं। रत्नप्रभा पृथ्वी की एक हजार योजन जाड़ाई छोड़ने के बाद भवनपति देवों के भवन तथा नरकावास आते हैं। इस एक हजार योजन में से ऊपर व नीचे दस दस योजन छोड़ कर मध्य के नौ सौ अस्सी योजन में असंख्य व्यन्तर देव रहते है।
रत्नप्रभा पृथ्वी पर मनुष्य और तिर्यञ्च जीव रहते हैं। यह तियक्लोक है। इसकी ऊँचाई अठारह सौ योजन है। इनमें से नौ सौ योजन रत्नप्रभा पृथ्वी के भीतर और नौ सौ योजन ऊपर इसकी सीमा है। व्यन्तर देव तिरछे लोक में हैं। ज्योतिषी देव, पृथ्वी से ऊपर हैं, फिर भी वह तिरछे लोक में ही है।
रत्नप्रभा पृथ्वी के मध्य में एक लाख योजन ऊँचा मेरु-पर्वत है। सूर्य, चन्द्र और ग्रह-नक्षत्रादि इससे 1121 योजन दूर रहते हुए परिक्रमा करते रहते हैं। इसमें एक ध्रुव का तारा ही निश्चल (?) है। नक्षत्रों में सबसे ऊपर स्वाति नक्षत्र है और सब से नीचे भरणी नक्षत्र है। दक्षिण में मूल और उत्तर में अभिजित् नक्षत्र है। इस जम्बूद्वीप में दो चन्द्र और दो सूर्य हैं। लवण-समुद्र में चार चन्द्र और चार सूर्य है। घातकीखंड में बारह चन्द्र और बारह सूर्य हैं। कालोदधि में बयालीस चन्द्र और बयालीस सूर्य हैं। पुष्करार्द्ध में 72 चन्द्र और 72 सूर्य हैं। इस प्रकार ढ़ाई द्वीप में 132 चन्द्र और 132 सूर्य हैं। प्रत्येक चन्द्र के साथ 88 ग्रह, 28 नक्षत्र और छासठ हजार नौ सौ पिचहत्तर कोटाकोटि ताराओं का परिवार है। ढ़ाई द्वीप के भीतर रहे हुए ये चन्द्रादि भ्रमणशील हैं।
इनके अतिरिक्त ढ़ाई द्वीप के बाहर रहे हुए स्थिर हैं। मध्य लोक में जम्बूद्वीप और लवण समुद्र आदि शुभ नाम वाले असंख्य द्वीप और समुद्र हैं और ये एक-दूसरे से उत्तरोत्तर द्विगुण अधिक विस्तार वाले हैं सभी समुद्र वलयाकार से द्वीप को घेरे हुए हैं। अंत में स्वयंभूरमण समुद्र है।
जम्बूद्वीप के सात खण्ड ये हैं – 1. भरत, 2. हेमवंत, 3. हरिवर्ष, 4. महाविदेह, 5. रम्यक् वर्ष, 6. हैरण्यवत और 7. ऐरवत।
इनके मध्य में वर्षधर पर्वत रहे हुए हैं, जिनसे इनके उत्तर और दक्षिण ऐसे दो विभाग हो जाते हैं।
इन पर्वतों के नाम-1.हिमवान्, 2. महाहिमवान्, 3. निषध, 4. नीलवंत, 5. रुक्मि और 6. शिखरी।
भरत क्षेत्र में गंगा सिन्धु ये दो बड़ी नदियाँ हैं। जम्बूद्वीप एक लाख योजन विस्तार का है। इसके चारों ओर दो लाख योजन का लवण समुद्र है। इसके आगे धातकीखण्ड इससे द्विगुण अधिक विस्तार वाला है। उसके आगे आठ लाख योजन का कालोदधि समुद्र है। इसके बाद 16 लाख योजन विस्तार वाला पुष्करवर द्वीप है। यह पुष्करवर द्वीप आधा (आठ लाख योजन)
तो मनुष्य क्षेत्र के अन्तर्गत है और आधा मनुष्य क्षेत्र के बाहर है। मनुष्य क्षेत्र कुल पेंतालीस लाख योजन परिमाण लम्बा है (2 लाख योजन का लवण समुद्र, 4 लाख योजन का धातकी खण्ड, 8 लाख योजन का कालोदधि, 8 लाख योजन का पुष्करार्द्ध।
ये 22 लाख योजन पूर्व और 22 लाख योजन पश्चिम में और 1 लाख योजन का जम्बू द्वीप, इस प्रकार कुल 45 लाख योजन का मनुष्य क्षेत्र हुआ।)।
इसके बाद असंख्य द्वीप समुद्र हैं। यह तिरछा लोक एक रज्जु परिमाण लम्बा है।
ऊर्ध्व-लोक में वैमानिक देव रहते हैं। इनमें 12 देवलोक तो कल्पयुक्त छोटे-बड़े, स्वामी सेवक और विविध प्रकार के व्यवहार से युक्त है और ९ ग्रैवेयक, पाँच अनुत्तर विमान, कल्पातीत-छोटे बड़े के व्यवहार रहित-अहमेन्द्र हैं। भवनपति और व्यन्तर देवों में अशुभ लेश्या की विशेषता है। भवनपति देवों में परमाधामी जैसे महान् क्रूर प्रकृति के महा मिथ्यात्वी देव भी हैं। इनके मनोरंजन क्रूरतापूर्ण भी होते हैं। ज्योतिषी देवों की परिणित वैसी नहीं है। उनके आमोद-प्रमोद भी उतनी क्लिष्ट परिणति वाले नहीं होते। वैमानिक देवों की आत्म परिणति उनसे भी विशेष प्रशस्त होती है। उत्तरोत्तर ऊँचे देवलोकों में वैषयिक रुचि एवं परिणति भी कम होती जाती है। ग्रैवेयक और अनुत्तर विमानवासी देवों में विषय वासना नहीं होती।
सब से ऊँचा देवलोक सर्वार्थ सिद्ध महा विमान है। वहाँ परम शुक्ल लेश्या वाले देव रहते है। अनुत्तर विमानों में एकान्त सम्यग्दृष्टि और पूर्वभव में चारित्र के उत्तम आराधक महात्मा ही उत्पन्न होते हैं। ये अवश्य ही मोक्ष में जाने वाले होते हैं। सर्वार्थ सिद्ध महा विमान के ऊपर सिद्धशिला है। सिद्धशिला के ऊपर लोकाग्र पर सिद्ध प्रभु (मुक्त जीव) रहते हैं। यह संस्थानविचय धर्म ध्यान है। जो बुद्धिमान, अशुभ ध्यान का निवारण करने के लिए समग्र लोक अथवा लोक के किसी विभाग का चिन्तन करते हैं, उन्हें धर्मध्यान सम्बन्धी क्षयोपशमिकादि भाव की प्राप्ति होती है। उनकी तेजोलेश्या, पद्मलेश्या तथा शुक्ललेश्या शुद्धतर होती जाती है।
उन्हें स्व-संवेद्य (स्वयं अनुभव करे ऐसा) अतीन्द्रिय सुख उत्पन्न होता है। जो स्थिर योगी महात्मा, निःसंग हो कर धर्मध्यान के चलते देह का त्याग करते हैं, वे ग्रैवेयकादि स्वर्गों में महान् ऋद्धिशाली उत्तम देव होते हैं। वहाँ वे अपना सुखी जीवन पूर्ण कर सम्पूर्ण अनुकूलता वाले उत्तम मनुष्य जन्म को प्राप्त करते हैं और उत्तम भोग भोगने के बाद संसार का त्याग कर, चारित्र धर्म की उत्कृष्ट आराधना कर के सिद्ध बुद्ध एवं मुक्त हो जाते हैं।”
भगवान की देशना सुनकर हजारों नर नारियों ने त्याग मार्ग स्वीकार किये। जिसमें सगर चक्रवर्ती के पिता सुमित्रविजय भी थे जो कि भगवान के काका थे तथा भाव-दीक्षित थे।
भगवान की दिव्य धर्म देशना से गणधर पद के अधिकारी “सिंहसेन” आदि 95 महापुरुषों ने दीक्षा ग्रहण की। भगवान के मुख से त्रिपदी का श्रवण कर उन्होंने चौदह पूर्व सहित द्वादशांगी की रचना की। भगवान ने विशाल मुनिसमूह एवं गणधरों के साथ सहस्राम्र उद्यान से निकलकर बाहर जनपद में विहार कर दिया। विहार करते हुए भगवान कोशांबी नगरी के निकट पहुँचे। वहाँ
शालिग्राम के निवासी शुद्धभट और उसकी पत्नी सुलक्षणा ने भगवान के पास प्रवज्या ग्रहण की।
श्री अजितनाथजी के 95 गणधर, 100000 साधु, 3,30,000 साध्वियाँ, 3720 चौदहपूर्वधारी, 12500 मनःपर्ययज्ञानी, 9,400 अवधिज्ञानी, 22000 केवली, 12400 वादी, 20400 वैक्रियलब्धिधारी, 298000 श्रावक एवं 545000 श्राविकाएँ हुई।
दीक्षा के बाद एक पूर्वांग कम लाख पूर्व बीतने पर अपना निर्वाण काल समीप जानकर भगवान श्री अजितनाथजी सम्मेतशिखर पर पधारे वहाँ 1 हजार मुनियों के साथ पादपोपगमन अनशन किया। एक मास के अन्त में चैत्र शुक्ला 5 के दिन मृगशिर नक्षत्र में 1 हजार मुनियों के साथ भगवान श्री अजितनाथजी ने निर्वाण प्राप्त किया। इन्द्रादि देवों ने निर्वाण-महोत्सव मनाया। प्रभु श्री अजितनाथजी की ऊंचाई 450 धनुष थी। श्री ऋषभदेवजी से आपकी ऊंचाई 50 धनुष कम थी।
अरिहंत प्रभु श्री अजितनाथजी ने 18 लाख पूर्व कुमार अवस्था में, 53 लाख पूर्व 84 लाख वर्ष राज्यत्व काल में, 12 वर्ष छद्मस्थ अवस्था में तथा 84 लाख 12 वर्ष कम 1 लाख पूर्व केवलज्ञान अवस्था में बिताये। इस तरह 72 लाख पूर्व की आयु समाप्त कर तीर्थंकर श्री अजितनाथजी तीर्थेश श्री ऋषभदेवजी के निर्वाण के 50 लाख करोड़ सागरोपम वर्ष के बाद मोक्ष में गये।
