शासनरत्न स्व. श्री सुरेन्द्र गुरुजी | Surendra Guruji

0
195

जिनशासन के प्रभावक थे विधिकारक शासनरत्न सुरेन्द्र गुरुजी

जैन समय। बेंगलूरु – अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त जैन विधिकारक सुरेन्द्रभाई सी. शाह गुरुजी का बेंगलूरु में 28 मई 2025 को स्वर्गवास हो गया। एक विलक्षण, प्रज्ञाशाली और प्रकाशमान
आत्मा थे अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त जैन विधिकारक पंडितवर्य सुरेन्द्रभाई सी. शाह, जिन्हें संपूर्ण जैन समाज में श्रद्धापूर्वक ‘गुरुजी’ कहा जाता है। प्रतिकूलताओं में भी धर्म में अडिग रहने वाले और हजारों विद्यार्थियों के जीवन में मूल्यों का बीजारोपण करने वाले प्रेरणास्रोत हैं। वे एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्था थे।
सुरेन्द्र गुरुजी का जन्म गुजरात के बनासकांठा जिले के एक छोटे से गाँव थरा में हुआ था। उनके माता पिता पुण्यशाली मधुबेन चोथालालजी शाह अत्यंत धर्मपरायण थे। मात्र 13 वर्ष की आयु में वे श्रीमद यशोविजयजी जैन संस्कृत पाठशाला, मेहसाणा में प्रविष्ट हुए, जहाँ उन्हें पंडित पुखराजजी और वसंतभाई जैसे गुरुजी के सान्निध्य में शिक्षा का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
17 साल की उम्र में श्री आदिनाथ जैन श्वे. मू.पू. संघ, चिकपेट, बेंगलूरु द्वारा संचालित श्री विजय लब्धिसूरि जैन धार्मिक पाठशाला में धार्मिक अध्यापक बने। तत्पश्चात विधिकारक नथमलजी भगत एवं धर्माध्यापक तिलकभाई के मार्गदर्शन में विधि विधान प्रारंभ किए। आपने अपने उच्च कोटि के ज्ञान और सेवा भावना से उच्च कोटि के जैन विधिकारक के रुप में प्रतिष्ठित हुए।गुरुजी के जीवन का मुख्य ध्येय रहा जैन धर्म की विधि परंपरा को सशक्त बनाना और प्रत्येक गृहस्थ को उसमें पारंगत करना। इसी उद्देश्य से उन्होंने अनेक जैन विधि ग्रंथों का लेखन और संपादन किया। सामायिक विधि, प्रतिक्रमण विधि, संघ पूजा विधि, श्रावकाचार विधि जैसे ग्रंथों को सरलता और प्रमाणिकता से प्रस्तुत किया। आपके द्वारा रचित पूजन, आरती, स्तवन, गीतिकाएँ सभी में भावों की गहराई, शब्दों की पवित्रता और आत्मा को छू जाने वाला अनुभव समाहित होता है।
गुरुजी ने हजारों जैन श्रावकों को विधिपूर्वक अनुष्ठान करना सिखाया। ‘सामायिक अनुष्ठान’, ‘प्रतिक्रमण अनुष्ठान’, ‘नवपद ओली आराधना’, ‘अष्टान्हिका आराधना’, ‘पंचकल्याणक पूजन’, ‘ऋषि पंचमी पूजा’ इन सबको उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टि, शास्त्रीय प्रमाण और आत्मिक भावों से परिपूर्ण रूप में लोगों तक पहुँचाया।
गुरुजी का स्वभाव अत्यंत विनम्र, अनुशासित और आत्मनिर्भर था। उन्होंने कभी किसी से कोई अपेक्षा नहीं की। वे किसी की निंदा नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में सभी जीव आत्मस्वरूप थे।
जिनशासन के प्रति अतुलनीय सेवाओं के उपलक्ष्य में संघ द्वारा आपको ‘शासन रत्न’ अलंकरण से सम्मानित किया गया। अपने जीवन में सामूहिक रूप से आचार्यदेव कलापूर्णसूरीश्वरजी के निर्वाण के उपलक्ष्य में पालिताणा के सौधर्म निवास में 200 आराधकों की नवाणु यात्रा, श्री हस्तगिरि, पालिताणा, गिरनार के 600 यात्रिकों का छःरि पालित संघ (सामूहिक), श्री गिरनार महातीर्थ में तीन-तीन बार नवाणु यात्रा (सामूहिक ), वनथली से गिरनार छःरि पालित संघ, ढंकगिरि से गिरनाथ छःरि पालित संघ, बेंगलुरु से पालिताणा (आदिनाथ से आदिनाथ) छःरि पालित संघ में संघपति के रूप में, सिद्धगिरि में 700 भक्तों का सामूहिक चातुर्मास और उपधान तप, बेंगलुरु में सामूहिक उपधान तप में सहयोगी, अहमदाबाद सुविधा अपार्टमेंट में भुवनभानु आराधना भवन में मुख्य प्रवेश द्वार का लाभ, पाटन कुमारपाल सोसाइटी में नीतिसूरि आराधना भवन में मुख्य प्रवेश द्वार का लाभ, बेंगलुरु नाहर जैन भवन में एक कमरे का
लाभ, श्री सिद्धाचल स्थूलभद्रधाम में 52 जिनालयों में स्थायी ध्वज का लाभ, मनवर्तपेट, बेंगलुरु में सुमतिनाथ जिनालय निर्माण, मूर्ति स्थापना, विराजमान और ध्वज का लाभ तथा प्रतिष्ठा महोत्सव का लाभ, श्री विशा नीमा धर्मशाला, पालिताणा में कमरे का निर्माण लाभ, जन्मभूमि थरा में वर्षगांठ के दिन स्थायी स्वामीवात्सल्य आदि अनेक सुकृत में सहयोगी बनने का लाभ लिया।
‘जैन समय’ समूह की ओर से सुरेन्द्र गुरुजी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनकी दिवंगत आत्मा को शीघ्र ही शाश्वत सुखों की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं।