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साधना – निरंतर प्रयत्न : आचार्य श्री रामेश

Acharya Sri Ramlalji Maharaj Saheb

मन-वचन-काया को सुव्यवस्थित करने के लिए जो निरन्तर प्रयत्न जारी रहता है, वह साधना है। मन को साधने के लिए देखना होगा कि मन कब किस रूप में परिणत हो जाता है। उसमें कब तनाव आता है, कब खुशी होती है। तनाव व प्रसन्नता के कारणों को जानकर उनकी समीक्षा करना कि क्या वस्तुतः अमुक कारण से तनाव आना चाहिये था? क्या तनाव जरूरी था ? क्या बिना तनाव के अमुक कारण का निवारण नहीं हो सकता था? क्या तनाव से कारण की निवृत्ति हो जाती है? इसी प्रकार प्रसन्नता के विषय में भी अनुप्रेक्षा करनी चाहिये। साथ ही यह भी जानने का प्रयत्न करना चाहिये कि तनावादि में अपना स्वार्थ तो निहित नहीं है? उसमें मैं, मेरे अहंकार को तो पुष्ट करने का प्रयत्न नहीं कर रहा होता हूँ? इस तरह शोध करने से हमारा अंतरंग हमारे सामने स्पष्ट होने लगेगा।
वचन की साधना का तात्पर्य वचन का सुव्यवस्थित रूप से प्रयुक्त करना, वचन का दुष्प्रयोग नहीं होना चाहिये। बोलने के पूर्व सोचना चाहिये कि मैं जो बोल रहा हूँ, उसका प्रभाव क्या होगा ? बोलते वक्त मेरे भाव कैसे हैं? मेरी बोली किसी की हँसी उड़ाने के लिए न हो। किसी का दिल दुखाने वाली न हो।

हमारी बोली से किसी का दिल दुख जाय, वह बात अलग है, हमारे भाव किसी को कष्ट पहुंचाने वाले न हों। भाषा सहज-सरल हो। घुमा फिरा कर कहने की प्रवृत्ति न हो। वचन सत्य हो, प्रिय हो, मधुर हो, दूसरों को सुहाने वाले हों।
काया का सम्यक् नियोजन करना काय साधना है। काया से यतना का पालन हो। काया की प्रवृत्ति किसी को कष्ट पहुँचाने वाली न हो। आगम के अनुसार जयं चरे जयं चिट्ठे, जयमासे जयं सुवे, जयं भुंजंतो भासंतो, पावं कम्मं न बंधई। अर्थात काया की समग्र प्रवृत्ति अहिंसा देवी की आराधना करने वाली हो। काया को जितना स्थिर रख सकें वह काय संवर का रूप होगा। इसी प्रकार मौन रखना वचन का संवर है तथा मन का गोपन करना मन का संवर है। मन-वचन-काया को सुव्यवस्थित करने के लिए निरन्तर प्रयत्न साधना है।

साभार : ‘आरोह’ – आचार्य श्री रामलालजी म.सा.

Sadhana – Continuous Effort : Acharya Shri Ramesh